वीर विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) - Veer Savarkar

 देश भगत वीर सावरकर स्वतन्त्रता संग्राम के अमर सेनानी विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को ग्राम भगूर जिला नासिक महाराष्ट्र में हुआ था। इनकी पिता श्री दामोदर सावरकर बड़े देशभगत, विद्याप्रेमी , सुसंस्कृत एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। इनकी माता श्रीमति राधाबाई बहुत विनम्र , परोपकारी  और धर्मनिष्ठ महिला थी। रामायण , महाभारत और केसरी साप्ताहिक समाचार पत्र का वचन अनुवचन उनके आंगन में प्रतिदिन आयोजित होता था। जिसमे गांव के ज्यादातर लोग सम्मिलित होते थे जिसके फलस्वरूप विनायक और उनके भाई गणेश सावरकर के मन में राष्ट्रीयता के एक अमिट छाप अंकित हो गयी थी। 
मेट्रिक के परिक्षा पास करके सावरकर ने 1902 में फगुर्सन कॉलेज पूना में प्रवेश लिया। अंग्रेजो के द्वारा बंगाल के विभाजन से देशभर में क्रोध के लहर दौड़ गयी। कॉलेज के सभी विद्याथियो ने भी विरोध में विनायक के साथ समस्त विदेशी वस्तुओ के बहिष्कार की प्रतिज्ञा करते हुए 7 अकटूबर 1905 की मध्यरात्रि को विशाल जनसमूह के समक्ष विदेश वस्तुओ की होली जलाई।  जिसके परिणाम स्वरूप सावरकर को उनके छात्रावास से बाहर निकल दिया गया और उन्हें आर्थिक अर्थदण्ड भी दिया गया। 
अच्छे वक़्ता , प्रतिभाशाली कवि और सिद्धहस्थ लेखक के रूप में सुविख्यात वीर सावरकर जी स्नातक पूर्ण करके कानून के पढ़ाई के लिए मुम्बई पहुँचे। वहाँ उन्होंने "अभिनव भारती" नमक क्रन्तिकारी नवयुवको की संस्था गठित की। 19 जून 1906 को लन्दन जाकर वहाँ स्वदेशाभिमानी भारतीयों के साथ मिलकर "स्वतंत्र भारत समाज" की स्थापना की तथा चुनिंदा लोगो को "अभिनव भारती" का सदस्य भी बनाया गया। 
इंग्लैंड के समाचार पत्रो में वे भारत की परिस्थिति को उजागर करने वाले लेख लिखते थे। "1857 का स्वतंत्रता संग्राम"  नामक तेजस्वी ग्रन्थ भी लिखे , जिन्हें अंग्रेज सरकार ने राष्ट्रीय विरोध कहकर जब्त कर लिया। लन्दन में ही 10 मई 1908 को "स्वतंत्र भारत समाज" की और से सन 1857 की क्रांति का पचासवाँ स्मृति दिवस आयोजित करके देशभगत वीरो के संकल्पो को पूरा करनी की सपथ लेकर ध्वज फहराया गया। भारतीय क्रांति के सूत्रधार के रूप में सावरकर को गिरफ़्तार करने के लिए अंग्रजो ने बहुत प्रयास करने जारी कर दिए। वीर सावरकर के भाई गणेश सावरकर को कालापानी की सजा देकर अण्डमान भेज किया गया। 
30 जनवरी 1911 को विनायक सावरकर को दोहरे कालापानी की सजा अर्थात अण्डमान को जेल की काल कोठरियों में 50 वर्ष की सजा सुनाई गई।  उस समय उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष की थी।  दिन भर कठोर श्रम व रात्रि में कोयले से कोठरी की दीवार पर शहीदों के काव्यात्मक आलेख लिखकर उनको वे तत्काल कंठस्थ कर लेते थे। 
16 जनवरी 1924 को वीर सावरकर को इस सशर्त कारगर से मुक्त कर दिया गया। 10 मई 1937 को उनकी  शर्तबद्धता समाप्त हो गयी।  स्वतंत्रता प्राप्ति के अथक प्रयासों के बाद 15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि को भारत स्वतन्त्र हुआ और 26 जनवरी 1966 को 83 वर्ष की  उम्र में देशभगत विनायक दामोदर सावरकर गॉलोसवासी हो गए।  उनके देश के प्रति किये गए योगदान को पूरा देश भुला नहीं पाया है। ये एक ऐसे वीर थे जिन्होंने अपना सारा जीवन देश को समर्पित कर दिया।

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