वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण Earliest Epigraphic Evidence of Vaishnavism in India
भारत का प्राचीन इतिहास केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि अभिलेखों (Inscriptions) से भी जीवंत होता है। शिलालेख हमें तत्कालीन समाज, धर्म, राजनीति और संस्कृति की ठोस जानकारी देते हैं। इसी क्रम में हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह शिलालेख वैष्णव धर्म (Vaishnavism) के प्रारंभिक स्वरूप को समझने की कुंजी है और यह सिद्ध करता है कि वासुदेव (कृष्ण) और संकरषण (बलराम) की उपासना ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी तक संगठित रूप ले चुकी थी।
यह लेख हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख पर एक विस्तृत, शोध-आधारित और परीक्षा-उपयोगी अध्ययन प्रस्तुत करता है, जिसमें इसके ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी पहलुओं को सरल मानव भाषा में समझाया गया है।
भौगोलिक स्थिति और खोज (Location & Discovery)
यह शिलालेख राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के गांव और समीपवर्ती हाथीबाड़ा क्षेत्र से प्राप्त हुआ।
घोसुण्डी, चित्तौड़गढ़ नगर से लगभग 8–10 किलोमीटर दूर स्थित एक प्राचीन स्थल है। यहाँ से प्राप्त यह अभिलेख इसलिए विशेष है क्योंकि यह धार्मिक इतिहास से जुड़ा है, न कि केवल प्रशासनिक आदेशों से।
शिलालेख के अवशेष कई खंडों में मिले, जिन्हें जोड़कर विद्वानों ने इसके पाठ (Text) का पुनर्निर्माण किया।
काल निर्धारण (Dating | काल निर्धारण कैसे हुआ?)
इतिहासकारों ने इस शिलालेख का काल निर्धारण निम्न आधारों पर किया:
- ब्राह्मी लिपि का प्रारंभिक रूप
- प्राकृत भाषा की संरचना
- शुंगकालीन (Shunga Period) सांस्कृतिक लक्षण
इन सभी तथ्यों के आधार पर इसका काल ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी (लगभग 200 BCE) माना गया है।
भाषा और लिपि (Language & Script)
लिपि – ब्राह्मी (Brahmi Script)
- मौर्य काल से प्रचलित
- आगे चलकर देवनागरी, बंगला, तमिल आदि भारतीय लिपियों की जननी
भाषा – प्राकृत (Prakrit Language)
- आम जनता की भाषा
- संस्कृत से सरल
- प्रारंभिक धार्मिक और सामाजिक अभिलेखों में प्रयुक्त
यह तथ्य दर्शाता है कि धर्म आम जनता तक पहुँच चुका था।
शिलालेख की विषय-वस्तु (Content of the Inscription)
शिलालेख में नारायण वाटिका (Narayan Vatika) नामक एक पवित्र परिसर के निर्माण का उल्लेख है। यह वाटिका:
- वासुदेव (कृष्ण)
- संकरषण (बलराम)
की पूजा के लिए बनाई गई थी।
इस कार्य का श्रेय एक शासक या कुलीन व्यक्ति सर्वतात (Sarvatata) को दिया गया है।
धार्मिक महत्व (Religious Significance)
यह शिलालेख भारतीय धार्मिक इतिहास में मील का पत्थर है क्योंकि:
- यह कृष्ण को देवता के रूप में प्रस्तुत करता है।
- बलराम (संकरषण) को भी समान धार्मिक महत्व देता है।
- वैष्णव धर्म के भागवत संप्रदाय की पुष्टि करता है।
यह सिद्ध होता है कि कृष्ण केवल महाभारत के नायक नहीं, बल्कि पूज्य ईश्वर थे।
वैष्णव धर्म का विकास (Development of Vaishnavism)
हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख से पहले वैष्णव धर्म का ज्ञान हमें मुख्यतः:
- पुराणों
- महाभारत
- हरिवंश
से मिलता था, जो साहित्यिक स्रोत हैं।
लेकिन यह शिलालेख भौतिक और ऐतिहासिक प्रमाण देता है।
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ (Political & Social Context)
- धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त था
- शासक वर्ग धार्मिक निर्माण कार्यों में रुचि लेता था
- समाज में भक्ति और आस्था का संगठित स्वरूप उभर रहा था
यह धर्म और सत्ता के सहयोग का प्रारंभिक उदाहरण है।
अन्य समकालीन अभिलेखों से तुलना (Comparison)
| शिलालेख | विशेषता |
|---|---|
| घोसुण्डी शिलालेख | वासुदेव-बलराम पूजा |
| बेसनगर शिलालेख | गरुड़ स्तंभ, विष्णु भक्ति |
| नानाघाट शिलालेख | यज्ञ परंपरा |
यह शिलालेख अत्यंत उपयोगी है:
- UPSC (Prelims + Mains)
- State PCS
- History Optional
- BA / MA History
संभावित प्रश्न:
वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण कौन-सा है?
उत्तर: हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख
Important Resource Links
- ASI – Archaeological Survey of India
- NCERT History (Class 12 – Ancient India)
- R.S. Sharma – India’s Ancient Past
- Upinder Singh – A History of Ancient and Early Medieval India
- Epigraphia Indica (Government of India)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख कहाँ मिला?
उत्तर: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के घोसुण्डी गाँव और हाथीबाड़ा क्षेत्र में।
Q2. यह शिलालेख किस काल का है?
उत्तर: ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी।
Q3. यह शिलालेख क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर: क्योंकि इसमें वासुदेव (कृष्ण) और संकरषण (बलराम) की पूजा का उल्लेख है।
Q4. शिलालेख की भाषा और लिपि क्या है?
उत्तर: भाषा – प्राकृत, लिपि – ब्राह्मी।
Q5. UPSC में इसका क्या महत्व है?
उत्तर: यह वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण है।
हाथीबाड़ा–घोसुण्डी शिलालेख न केवल एक पत्थर पर उकेरा गया लेख है, बल्कि यह उस युग की आस्था, संस्कृति और धार्मिक चेतना का सजीव प्रमाण है। यह सिद्ध करता है कि कृष्ण-भक्ति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसका विकास समाज और राज्य—दोनों के सहयोग से हुआ।
यह शिलालेख भारतीय इतिहास में धर्म, राजनीति और समाज के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

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