UPSC, युवा आकांक्षाएँ और भारत का भविष्य: परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था से स्किल-आधारित राष्ट्र की ओर
भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसांख्यिकीय लाभ (demographic dividend), तेज़ तकनीकी परिवर्तन (AI, ऑटोमेशन, डेटा) और बदलती युवा मानसिकता—तीनों एक साथ दिशा तय कर रहे हैं। लंबे समय तक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और सत्ता के कारण सिविल सेवाएँ युवाओं की पहली पसंद रहीं। पर अब प्रश्न उठ रहे हैं: क्या सीमित सीटों वाली, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया में युवाओं के सबसे उत्पादक वर्ष खपाना देश और व्यक्ति—दोनों के लिए सर्वोत्तम है? क्या आज के जटिल, तकनीक-प्रधान शासन में जनरलिस्ट की बजाय स्पेशलिस्ट अधिक उपयोगी हैं? और क्या शिक्षा-रोज़गार तंत्र को डिग्री-केंद्रित से स्किल-केंद्रित बनना चाहिए?
इन प्रश्नों के केंद्र में अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य Sanjeev Sanyal के तर्क हैं, जिन पर व्यापक सार्वजनिक बहस हो रही है। इस लेख में युवा आकांक्षाओं, सिविल सेवाओं के ऐतिहासिक उद्देश्य, वर्तमान चुनौतियों, लेटरल एंट्री, AI-युग की माँगों और नीति-सुझावों को पूरी तरह, बिंदुवार और विस्तार से प्रस्तुत किया गया है—ताकि कोई भी पहलू छूटे नहीं।
1) युवा पीढ़ी की बदलती महत्वाकांक्षाएँ
1.1 नौकरी से अनुभव और उद्यमिता की ओर
आज की युवा पीढ़ी केवल “नौकरी” को अंतिम लक्ष्य नहीं मान रही। पहले अनुभव, फिर बिज़नेस/स्टार्ट-अप—यह सोच तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है। 12वीं के बाद सीधे प्रतिष्ठित डिग्री या सरकारी नौकरी की दौड़ की बजाय कौशल, नेटवर्क और वास्तविक समस्या-समाधान पर जोर बढ़ा है।
सकारात्मक पक्ष:
- जोखिम लेने की क्षमता
- नवाचार और मूल्य-निर्माण
- वैश्विक बाज़ार से जुड़ाव
चुनौती:
- सही दिशा-निर्देशन का अभाव
- गलत कोर्स/डिग्री चुनने का खतरा
- स्किल-मैपिंग की कमी
1.2 दिशा पहले, डिग्री बाद में
युवाओं के लिए मूल संदेश—पहले “मैं क्या बनना चाहता/चाहती हूँ?” स्पष्ट हो; उसके बाद कोर्स, डिग्री और प्रमाणपत्र चुने जाएँ। केवल इसलिए किसी स्ट्रीम में प्रवेश न लें कि दूसरी में सीट नहीं मिली।
2) सिविल सेवाओं का ऐतिहासिक संदर्भ
2.1 ICS से IAS/IPS तक
ब्रिटिश काल में इंडियन सिविल सर्विस (ICS) का उद्देश्य औपनिवेशिक प्रशासन को मज़बूत रखना था। स्वतंत्रता के बाद यही ढाँचा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) आदि में बदला।
मूल उद्देश्य:
- ज़िला स्तर पर प्रभावी प्रशासन
- क़ानून-व्यवस्था, राजस्व, विकास योजनाओं का क्रियान्वयन
- जनता को न्याय और सरकार की विश्वसनीयता
2.2 जनरलिस्ट मॉडल की उपयोगिता
परंपरागत मॉडल में एक अफ़सर अलग-अलग विभागों में कार्य करते हुए “जनरलिस्ट” बनता है। यह मॉडल स्थिर, धीमी-गति वाली अर्थव्यवस्था में कारगर रहा।
आज की चुनौती:
- साइबर सुरक्षा, फाइनेंस, जलवायु, डेटा गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता चाहिए
- तेज़ निर्णय और तकनीकी समझ अनिवार्य
3) UPSC: सफलता दर और उत्पादक उम्र का प्रश्न
3.1 आँकड़ों की कठोर सच्चाई
हर वर्ष लगभग 10 लाख अभ्यर्थी परीक्षा देते हैं, जबकि चयन लगभग 1000 का होता है—यानी सफलता दर ~0.1%।
निहितार्थ:
- 22–30 वर्ष की सबसे उत्पादक उम्र कई बार 5–7 साल की तैयारी में लग जाती है
- चयन न होने पर अनेक अभ्यर्थियों के पास बाज़ार-उपयोगी स्किल्स नहीं रहतीं
3.2 आर्थिक लागत (Opportunity Cost)
जब लाखों युवा अपने सर्वश्रेष्ठ वर्ष एक अत्यंत कम-संभावना वाली प्रक्रिया में लगाते हैं, तो यह व्यक्ति ही नहीं—पूरी अर्थव्यवस्था के लिए अवसर-हानि है।
- नवाचार में जाने वाली प्रतिभा प्रशासनिक तैयारी में अटक जाती है
- निजी क्षेत्र और स्टार्ट-अप्स को कुशल मानव-पूंजी कम मिलती है
4) स्किल्स बनाम डिग्रियाँ
4.1 AI युग में डिग्री की सीमाएँ
AI, ऑटोमेशन और नो-कोड/लो-कोड टूल्स ने काम की प्रकृति बदल दी है। केवल डिग्री पर्याप्त नहीं; कोडिंग, डिज़ाइन, डेटा, प्रोडक्ट-थिंकिंग जैसी वास्तविक स्किल्स निर्णायक हैं।
समस्या:
- “Unemployable Graduates”—डिग्री है, पर काम करने लायक स्किल नहीं
4.2 निरंतर सीखना (Lifelong Learning)
एक डिग्री जीवनभर के लिए पर्याप्त नहीं। माइक्रो-क्रेडेंशियल्स, सर्टिफिकेट, प्रोजेक्ट-आधारित सीखना आवश्यक है।
- परिणाम-आधारित शिक्षा
- उद्योग-अकादमिक साझेदारी
- कौशल-मापन (Skill Assessment)
5) परीक्षा-राज्य से नवाचार-राज्य की ओर
5.1 Examination State की सीमाएँ
जब पूरा तंत्र परीक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमता है, तो रटंत, कोचिंग-निर्भरता और तनाव बढ़ता है।
5.2 Innovation State की आवश्यकता
- समस्या-समाधान को प्राथमिकता
- स्टार्ट-अप, रिसर्च, पेटेंट
- नीति-निर्माण में विशेषज्ञता
6) लेटरल एंट्री: अवधारणा और तर्क
6.1 क्या है लेटरल एंट्री?
परंपरागत जनरलिस्ट IAS के साथ-साथ निजी क्षेत्र/अकादमिक क्षेत्र के 15–20 वर्ष अनुभवी विशेषज्ञों को सीधे जॉइंट सेक्रेटरी/डायरेक्टर स्तर पर नियुक्त करना।
उद्देश्य:
- साइबर, फाइनेंस, ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल गवर्नेंस में त्वरित क्षमता
- फ़ाइल-प्रक्रिया में गति और परिणाम
6.2 समर्थन और विरोध
समर्थन:
- विशेषज्ञता से नीति-गुणवत्ता बेहतर
- कॉर्पोरेट अनुशासन और KPI-संस्कृति
विरोध/चिंताएँ:
- आरक्षण और निष्पक्षता
- प्रशासनिक संस्कृति से तालमेल
इस संदर्भ में राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी सामने आईं; उदाहरणस्वरूप Rahul Gandhi ने आरक्षण से जुड़े प्रश्न उठाए।
7) नीति-पर्यावरण: NEP और Academic Bank of Credits
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत Academic Bank of Credits (ABC) से 1–4 वर्षों में लचीले सर्टिफिकेट/डिग्री मार्ग संभव हैं।
लाभ:
- ड्रॉप-आउट के बाद भी क्रेडिट सुरक्षित
- स्किल-आधारित मॉड्यूलर शिक्षा
- उद्योग-अनुकूल पाठ्यक्रम
8) कार्यान्वयन की चुनौतियाँ
8.1 निजी क्षेत्र में रोज़गार सृजन
केवल प्रशासनिक सुधार पर्याप्त नहीं; निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोज़गार चाहिए।
8.2 निष्पक्ष भर्ती
- पारदर्शी चयन
- उम्र/डिग्री की बजाय स्किल-आधारित मूल्यांकन
- 50 वर्ष के अनुभवी प्रोफेशनल को भी अवसर
9) नेतृत्व के उदाहरण और विशेषज्ञता
आज के शासन में विषय-विशेषज्ञ मंत्रियों/नीति-निर्माताओं की भूमिका रेखांकित होती है। उदाहरण के तौर पर Ashwini Vaishnaw और S. Jaishankar जैसे नाम विशेषज्ञता-आधारित नेतृत्व के उदाहरण के रूप में उद्धृत किए जाते हैं।
10) युवाओं के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन
- लक्ष्य स्पष्ट करें: प्रशासन, कॉर्पोरेट, स्टार्ट-अप—क्या और क्यों?
- स्किल-मैपिंग करें: बाज़ार की माँग समझें
- मल्टी-प्लान रखें: एक ही विकल्प पर सब कुछ दाँव न लगाएँ
- निरंतर सीखें: माइक्रो-स्किल्स, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप
- कोचिंग-निर्भरता घटाएँ: स्व-अध्ययन और वास्तविक काम पर जोर
सिविल सेवाएँ आज भी महत्वपूर्ण हैं, पर उनका स्वरूप, चयन और कार्य-संस्कृति समय के साथ विकसित होनी चाहिए। अत्यंत कम सफलता-दर वाली प्रक्रिया में युवाओं की उत्पादक उम्र का बड़ा हिस्सा लगना—व्यक्ति और देश दोनों के लिए जोखिम है।
आवश्यक है कि:
- स्किल-आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिले
- विशेषज्ञता को शासन में स्थान मिले
- लेटरल एंट्री जैसे उपाय निष्पक्षता के साथ लागू हों
- युवा अपनी दिशा स्वयं तय करें, भीड़ के पीछे न चलें
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए परीक्षा-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर नवाचार, विशेषज्ञता और उद्यमिता-केंद्रित राष्ट्र बनना अनिवार्य है।

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